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मैहर घराने में शततंत्री वीणा का समावेश

पंडित दिशारी चक्रवर्ती

 

कश्मीरी संतूर को सेनिया–मैहर परंपरा में सम्मिलित करने की यात्रा न तो पारंपरिक रही है और न ही सरल। यह मार्ग दृढ़ विश्वास, संघर्ष, गहन आत्ममंथन और निरंतर साधना से निर्मित हुआ है।

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प्रारंभिक प्रेरणा और पारिवारिक संकल्प

मेरी प्रथम गुरु मेरी माता थीं। उन्होंने बहुत कम आयु में मुझे संगीत से परिचित कराया। चार वर्ष की आयु में जब मैंने पंडित शिव कुमार शर्मा का एक कार्यक्रम सुना, तो संतूर के प्रति मेरे भीतर एक अव्यक्त आकर्षण जागृत हुआ। उसी क्षण ने मेरे जीवन की दिशा निर्धारित कर दी।

 

यद्यपि मेरा परिवार चाहता था कि मैं साथ-साथ गायन और वादन दोनों का अभ्यास करूँ, किंतु लगातार टॉन्सिल की समस्या के कारण औपचारिक गायन प्रशिक्षण कठिन हो गया। मेरी माता चाहती थीं कि मैं सरोद सीखूँ, जो मैहर घराने का मुख्य वाद्य है। परंतु मेरे पिता ने संतूर के प्रति मेरी रुचि का सम्मान किया। फिर भी मेरी माता की एक अटल शर्त थी — मुझे शिक्षा मैहर घराने में ही लेनी होगी।

 

यह एक विशिष्ट चुनौती थी। उस्ताद अलाउद्दीन ख़ाँ की परंपरा में किसी ने संतूर नहीं बजाया था। सेनिया–मैहर शैली में इस वाद्य की कोई स्थापित परंपरा नहीं थी। फिर भी पाँच वर्ष की आयु में मेरे पिता मुझे कोलकाता में उस्ताद अलाउद्दीन ख़ाँ के निवास पर ले गए और उस्ताद ध्यानेष ख़ाँ (उस्ताद अली अकबर ख़ाँ के मध्यम पुत्र) से संतूर की शिक्षा देने का अनुरोध किया। यह प्रस्ताव सभी को आश्चर्यचकित कर गया।

 

मेरी माता का संकल्प असाधारण था — वे अपने पुत्र को उस परंपरा में संतूर सिखाने लाई थीं जहाँ यह वाद्य प्रचलित ही नहीं था। उनकी दृढ़ता देखकर उस्ताद ध्यानेष ख़ाँ ने कहा कि मैं तत्काल प्रयोग के लिए बहुत छोटा हूँ, किंतु बीज बोया जा चुका था।

जहाँ पद्धति नहीं थी, वहाँ पद्धति का निर्माण

छः महीनों तक मैं प्रतिदिन घर पर संतूर लेकर बैठता रहा, मार्गदर्शन की प्रतीक्षा में। इस दौरान गुरुजी ध्यानेष ख़ाँ ने अपने गुरुजनों — माँ अन्नपूर्णा देवी, पंडित रवि शंकर और उस्ताद अली अकबर ख़ाँ — से परामर्श आरंभ किया कि मैहर की सौंदर्य-दृष्टि में इस वाद्य को कैसे प्रशिक्षित किया जाए।

 

उन्होंने मैहर बैंड के बैंडमास्टर झुरेलालजी से नालतरंग के बोलों की तकनीक का अध्ययन किया। किंतु नालतरंग लोहे की पट्टियों पर बजाया जाता है जिनमें कंपन नहीं होता, जबकि संतूर तारों पर आधारित है जहाँ अनुनाद और कंपन अभिव्यक्ति का प्रमुख साधन है। इस कंपन को अभिव्यक्ति का अंग कैसे बनाया जाए — यह हमारे अनुसंधान का केंद्र बना।

 

संभावनाओं के विश्लेषण हेतु गुरुजी ने पंडित शिव कुमार शर्मा के वादन का गहन अवलोकन प्रारंभ किया। विदेश से भेजे गए एक हैंडीकैम द्वारा कार्यक्रम रिकॉर्ड किए गए, और अनुमति से मुझे मंच पर बैठकर सुनने का अवसर मिला। किंतु मात्र अवलोकन पर्याप्त नहीं था; अंततः इन अनुभवों को वाद्य पर मूर्त रूप देना मुझे ही था।

 

गुरुजी ने अनुभव किया कि शिव कुमार शर्मा जी के अलंकार अधिकतर अंतर्ज्ञान आधारित और व्यक्तिगत थे, न कि किसी पारंपरिक घराने की संरचित प्रणाली के अंतर्गत। स्वयं शिवजी ने स्वीकार किया था कि वे माँ अन्नपूर्णा देवी से शिक्षा लेना चाहते थे, किंतु उनके पिता का मत था कि संतूर को सितार या सरोद अंग का अनुकरण नहीं करना चाहिए, बल्कि कश्मीरी लोक परंपरा से विकसित होना चाहिए। इस प्रकार उनका वादन अत्यंत मौलिक और पथप्रदर्शक होते हुए भी मुख्यधारा की शास्त्रीय परंपरा से भिन्न रहा। हमारा उद्देश्य भिन्न था — संतूर को सेनिया–मैहर परंपरा की व्याकरण में पुनर्स्थापित करना।

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पवित्र दीक्षा और प्रारंभिक प्रशिक्षण

मेरा दूसरा संतूर, जो मुंबई में कश्मीर के गुलाम मोहम्मद द्वारा निर्मित था, गुरुजी द्वारा मैहर ले जाया गया। उसे माँ शारदा देवी के मंदिर में पूजित किया गया और बाबा अलाउद्दीन ख़ाँ की समाधि से स्पर्श कराकर मुझे सौंपा गया। वह वाद्य मात्र साधन नहीं, बल्कि एक पवित्र उत्तरदायित्व बन गया।

 

नए वाद्य से पूर्व ही मैं राग यमन और भैरवी सीख चुका था। उस पर मैंने मसीतखानी गत से आरंभ किया और बाद में अलाउद्दीन ख़ाँ से संबद्ध द्रुत रचनाओं का अभ्यास किया। पंडित रवि शंकर की राग बिहाग में चौतालबद्ध ध्रुपद अंग की रचना भी सिखाई गई। सीधा-झाला और ठोक-झाला की तकनीकों को संतूर की संरचना के अनुरूप ढाला गया।

 

गुरुजी स्वयं संतूर नहीं बजाते थे, इसलिए वे स्वरों को गाकर समझाते और मुझे उन्हें वाद्य पर उतारना होता। संशोधन श्रवण द्वारा होते। इस पद्धति ने मेरी श्रवण शक्ति और स्वतंत्र चिंतन को तीक्ष्ण बनाया।

 

वियोग, अनिश्चितता और उत्तरदायित्व

मेरे प्रथम एकल कार्यक्रम के दिन गुरुजी अस्पताल में थे। कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग उन्हें सुनाई गई। 11 अक्टूबर 1991 को उनके देहावसान से पूर्व उन्होंने कहा कि यद्यपि वे मेरा प्रशिक्षण पूर्ण नहीं कर सके, किंतु अन्य लोगों को इसे आगे बढ़ाना चाहिए। उनका निधन अपूरणीय शून्य छोड़ गया।

 

उस्ताद अली अकबर ख़ाँ ने आश्वासन दिया कि ध्यानेष ख़ाँ ने मेरे भविष्य की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी है। मेरे माता-पिता से पूर्व में ही यह शर्त रखी गई थी कि इस परंपरा में प्रवेश के बाद मेरे संगीत संबंधी निर्णय गुरु के अधीन होंगे।

 

ग्यारह वर्ष की आयु में मैंने सीसीआरटी छात्रवृत्ति में विशेष योग्यता प्राप्त की और बाद में ओस्लो में अनुल लुंड रेज मेमोरियल फंड द्वारा सम्मानित होने वाला सबसे कम आयु का भारतीय शास्त्रीय वादक बना। 1995 में संयुक्त राष्ट्र की 50वीं वर्षगाँठ पर स्मारक रजत मुद्रा भी प्रदान की गई। फिर भी आंतरिक रूप से मेरा प्रशिक्षण अधूरा प्रतीत होता था।

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अन्य वाद्यों के माध्यम से विस्तार

उस्ताद आशीष ख़ाँ के सान्निध्य में सरोद का गहन अध्ययन आरंभ हुआ। इससे बीनकारी अंग और अलंकरण की समझ बढ़ी, किंतु संतूर की तकनीकी और स्वर-स्थापन संबंधी जटिलताओं का प्रत्यक्ष समाधान नहीं हुआ।

 

विदुषी अमीना परेरा के साथ संवाद हेतु मैंने सितार भी सीखी। धीरे-धीरे अनुभव हुआ कि मुझे स्वयं अपना मार्गदर्शक बनना होगा। सेनिया–मैहर शैली में संतूर वादन का कोई पूर्व उदाहरण नहीं था; समन्वय की जिम्मेदारी मुझ पर ही थी।

 

ध्यानेष ख़ाँ के निधन के तीन वर्ष पश्चात उस्ताद अली अकबर ख़ाँ ने मुझे तीन महीनों तक रबाबी और बीनकारी अंग में प्रशिक्षित किया। बारह दुर्लभ रागों की रचनाओं द्वारा मैंने मसीतखानी, उज़ीरखानी और अलाउद्दीन ख़ानी बोल संरचनाएँ आत्मसात कीं।

 

इसके अतिरिक्त मेरा प्रशिक्षण निम्न प्रकार से विस्तृत हुआ

• पंडित शंकर घोष से दुर्लभ राग और पखावज अंग

• प्रो. डॉ. ई.एस. परेरा से संगीतशास्त्र

• गुरु गौतम गुहा से तबला और लयकारी

• डॉ. विनय भरताराम से शुद्धवाणी गायकी

• पंडित जतिन भट्टाचार्य से ध्रुपद अंग और सुरशृंगार बाज

• विदुषी जुबेदा ख़ाँ से बाबा अलाउद्दीन ख़ाँ की दैनिक शिक्षण पद्धति का अध्ययन

• शैलेन्द्र शर्मा से मैहर बैंड की रचनाएँ और नालतरंग

 

जो साधना सामान्यतः एक दशक लेती, उसमें मुझे लगभग तीस वर्ष लगे — प्रतिदिन चौदह से पंद्रह घंटे रियाज़ के साथ। सरोद, सितार, पखावज, गायन और सुरशृंगार की तकनीकों को संतूर की भाषा में रूपांतरित करना, बिना उसकी अस्मिता को क्षति पहुँचाए, इस प्रक्रिया का मूल था।

 

मान्यता के लिए संघर्ष

विडंबना यह रही कि संतूर की लोकप्रियता के बावजूद, शास्त्रीय प्रतिष्ठान में उसे सीमांत ही माना गया। चूँकि मेरे गुरु संतूर वादक नहीं थे, इसलिए मैहर घराने से मेरा संबंध अक्सर संदेह की दृष्टि से देखा गया। कार्यक्रमों के अवसर सीमित रहे और आत्मविश्वास डगमगाया। फिर भी साधना जारी रही।

 

महामारी के पश्चात मुझे बांग्लादेश से आमंत्रण प्राप्त हुआ, जहाँ बांग्लादेश शिल्पकला अकादमी के साथ कार्य किया और अनेक कार्यक्रम प्रस्तुत किए। वहाँ व्यापक मीडिया कवरेज के परिणामस्वरूप कोलकाता और भारत में पुनः पहचान मिली, और प्रमुख संगीत समारोहों में आमंत्रण प्राप्त हुए।

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उपसंहार: एक आजीवन साधना​

मैहर घराने में संतूर का समावेश मात्र शैलीगत परिवर्तन नहीं, बल्कि दार्शनिक और संरचनात्मक एकीकरण है। इसमें तकनीक, स्वर-स्थापन, बोल संरचना, अंग और सौंदर्य-दृष्टि का पुनर्विचार सम्मिलित रहा।

 

यह यात्रा मातृ-संकल्प, महान गुरुओं के आशीर्वाद, व्यक्तिगत संघर्ष और दशकों की अनुशासित साधना से निर्मित हुई है। यदि आज संतूर को सेनिया–मैहर परंपरा में सार्थक रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है, तो वह सुविधा का परिणाम नहीं, बल्कि भक्ति, अनुसंधान और गुरु-परंपरा के प्रति समर्पण का फल है। यह यात्रा अभी भी जारी है।

पंडित दिशारी चक्रवर्ती

सेनिया परंपरा का एक भक्त

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